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एमएसपी पर शर्तें लगाकर किसानों के साथ अन्याय कर रही है सरकार: सैलजा

एमएसपी पर शर्तें लगाकर किसानों के साथ अन्याय कर रही है सरकार: सैलजा

 

-किसानों को मजबूर होकर अपनी उपज निजी व्यापारियों को कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है

 

-पोर्टल और ओटीपी जैसी जटिल प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए

 

चंडीगढ़, 15 अप्रैल।

 

सिरसा की सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव कुमारी सैलजा ने हरियाणा में किसानों को एमएसपी के नाम पर परेशान किए जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अनाज मंडियों के दौरे के दौरान जो स्थिति सामने आई है, वह बेहद चिंताजनक है।

 

कुमारी सैलजा ने कहा कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा में हरियाणा और पंजाब की महत्वपूर्ण भूमिका है। गेहूं जैसी प्रमुख फसल, जिसकी जरूरत पूरे देश को होती है, उसे हरियाणा और पंजाब के किसान पूरा करते हैं। इसके बावजूद जिन फसलों की देश को आवश्यकता है, उनकी उपज के लिए किसानों को पोर्टल और ओटीपी जैसी प्रक्रियाओं के नाम पर परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एमएसपी केंद्र सरकार द्वारा घोषित किया जाता है, लेकिन हरियाणा सरकार उस पर इतनी शर्तें लगा रही है कि किसानों के लिए इसका लाभ लेना मुश्किल हो गया है। यह किसानों के साथ सीधा अन्याय है। कुमारी सैलजा ने आरोप लगाया कि 24 फसलों पर एमएसपी देने के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं। कई फसलों की खरीद या तो नाम मात्र की हो रही है या बिल्कुल नहीं हो रही, जिससे किसानों को मजबूर होकर अपनी उपज निजी व्यापारियों को कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि यह पूरी व्यवस्था किसानों को आर्थिक रूप से कमजोर करने और उन्हें कर्ज के जाल में फंसाने का काम कर रही है।

 

उन्होंने सरकार से मांग की कि एमएसपी पर बिना शर्त और पारदर्शी खरीद सुनिश्चित की जाए तथा पोर्टल और ओटीपी जैसी जटिल प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए।

 

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महिला आरक्षण पर ‘राजनीतिक स्टंट’ का आरोप महिला आरक्षण बिल को लेकर सांसद सैलजा का मानना है कि यह महिलाओं को वास्तविक अधिकार देने के बजाय एक राजनीतिक स्टंट के रूप में पेश किया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा सरकार ने बिल को लागू करने की ठोस समयसीमा और स्पष्ट प्रक्रिया तय नहीं की, जिससे यह केवल चुनावी लाभ लेने का माध्यम बनकर रह गया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती है तो तत्काल प्रभाव से आरक्षण लागू कर उन्हें राजनीतिक भागीदारी का अवसर देना चाहिए। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसे टालने और शर्तों में उलझाने की नीति से यह स्पष्ट होता है कि महिला आरक्षण का मुद्दा केवल जनता की भावनाओं को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

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