कोहली की खुलेआम पैरवी ने सिख हृदयों को गहरी चोट पहुंचाई : प्रो. सरचंद सिंह ख्याला।
पांच साल चार महीने में शिरोमणि कमेटी लापता पावन स्वरूपों की तलाश के लिए एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी।
शिरोमणि कमेटी को अधिकारों का ज्ञान है, लेकिन कर्तव्यों से क्यों बेख़बर है?
328 पावन स्वरूपों के मामले में बादल नेतृत्व की बेशर्मी—पंथक भरोसे के साथ खुला खिलवाड़।
अमृतसर, 4 जनवरी—
सिख चिंतक एवं पंजाब भाजपा के प्रवक्ता प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने कहा कि यह अत्यंत हैरान करने वाली और शर्मनाक बात है कि 328 पावन स्वरूपों के मामले में गिरफ्तार किए गए सतिंदर सिंह कोहली को केवल सुखबीर सिंह बादल का करीबी होने के कारण बादल नेतृत्व न केवल बचाने का प्रयास कर रहा है, बल्कि उसके पक्ष में हर संभव हथकंडा भी अपना रहा है। कोहली की खुलेआम पैरवी करते हुए हर लक्ष्मण रेखा पार कर कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करना सिख भावनाओं पर गहरी चोट पहुंचाने के समान है, जिसे ये लोग पूरी तरह सजग होकर अंजाम दे रहे हैं।सिख समुदाय जवाब चाहता है।
प्रो. ख्याला ने कहा कि वर्ष 2020 में ईश्वर सिंह समिति की जांच रिपोर्ट में 328 पावन स्वरूपों की कमी सामने आने के बाद शिरोमणि कमेटी की यह सीधी जिम्मेदारी बनती थी कि वह यह पता लगाए कि ये पावन स्वरूप कहां गए और किस स्थिति में हैं। लेकिन पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो इसका कोई जवाब दिया जा सका और न ही इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास किया गया।
उन्होंने कहा कि हाल ही में श्री अकाल तख्त साहिब से पांच सिंह साहिबान द्वारा प्रचारकों और विज्ञापनों के माध्यम से लापता पावन स्वरूपों की तलाश के लिए दिया गया आदेश इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि न तो शिरोमणि कमेटी और न ही अकाल तख्त सचिवालय के पास इस मामले से संबंधित कोई ठोस जानकारी उपलब्ध है। यह स्थिति शिरोमणि कमेटी की पूर्ण विफलता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करती है।
चवर तख्त के मालिक श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति इस प्रकार की असंवेदनशीलता और लापरवाही यह प्रमाणित करती है कि शिरोमणि कमेटी और बादल नेतृत्व अपने पंथक सरोकारों से पूरी तरह भटक चुके हैं। अपनी सफाई में ये लोग भले ही अकाल तख्त साहिब को ढाल बनाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि वे सिख संगत का भरोसा, नैतिक अधिकार और प्रतिष्ठा खो चुके हैं।
प्रो. सरचंद सिंह ने कहा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को अपने अधिकारों की तो पूरी जानकारी है, लेकिन क्या वह जानबूझकर अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की अनदेखी कर रही है? सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 के तहत प्राप्त अधिकारों का उल्लेख तो बार-बार किया जाता है, लेकिन यह क्यों भुला दिया जाता है कि उसी अधिनियम के अंतर्गत कमेटी पर कर्तव्य भी लागू होते हैं।
गुरुद्वारा अधिनियम की धारा 142 स्पष्ट करती है कि शिरोमणि कमेटी, उसके अध्यक्ष, सदस्य और कर्मचारी किसी भी प्रकार की लापरवाही, कर्तव्यहीनता या विश्वासघात के मामले में कानून से ऊपर नहीं हैं। ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सिख गुरुद्वारा न्यायिक आयोग को है और अंतिम जवाबदेही उच्च न्यायालय तक जाती है।
प्रो. ख्याला ने स्पष्ट किया कि यह मामला उच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत दर्ज किए गए पुलिस केस से जुड़ा है। इसलिए शिरोमणि कमेटी और बादल नेतृत्व को यह समझना होगा कि वे केवल पंथक रूप से ही नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी अदालत के प्रति जवाबदेह हैं।
उन्होंने यह भी गंभीर प्रश्न उठाया कि 27 अगस्त 2020 को श्री अकाल तख्त साहिब के आदेशानुसार पारित प्रस्ताव संख्या 466—जिसमें दोषियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का निर्णय लिया गया था—को बाद में प्रस्ताव संख्या 493 द्वारा रद्द कर केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित कर देना क्या अकाल तख्त साहिब के आदेशों का घोर उल्लंघन नहीं है?
प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने कहा कि बादल नेतृत्व यह भ्रम पाले बैठा था कि पावन स्वरूपों की कमी की भरपाई धन से कर दी जाएगी, लेकिन जांच आयोग की रिपोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि ऐसी सोच रखने वालों के लिए संदेश साफ है—
“आप मालिक के घर बख्शे नहीं जाएंगे।”


