कृष्ण लाल मनचंदा जी – लोकसेवा और राष्ट्रभक्ति के लिए समर्पित जीवन
कृष्ण लाल मनचंदा जी का जन्म 24 मार्च 1935 को लालियाँ कस्बे (चिन्योटी ज़िला) में श्री बरकत राम और श्रीमती भाइयाँ देवी के घर हुआ। उनका लालन-पालन इसी कस्बे में हुआ। भारत विभाजन के समय उनके परिवार को अपना सब कुछ छोड़कर कठिन परिस्थितियों में भारत आना पड़ा। परिवार ने अपनी जान बचाकर भारत में शरण ली और कुरुक्षेत्र में बस गए।
शिक्षा प्राप्त करने के बाद कृष्ण लाल जी ने 1956 में चंडीगढ़ में किताबों और स्टेशनरी का व्यवसाय शुरू किया। लेकिन व्यापार से अधिक उनका मन सामाजिक और राष्ट्रसेवा की ओर आकर्षित रहता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने युवावस्था से ही शाखाओं और कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी शुरू की। वे हमेशा जरूरतमंदों की मदद और समाजसेवा के लिए तत्पर रहते थे।
1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार का विरोध करने पर उन्हें गिरफ्तार कर 19 महीने तक बुड़ैल जेल में रखा गया। वहां उनका साथ श्री ज्ञानचंद गुप्ता, श्री सतपाल जैन, श्री जयराम जोशी और श्री रामसरूप शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने दिया। जेल से छूटने के बाद भी उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत हो गई।
1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद उन्हें चंडीगढ़ बीजेपी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह समय पंजाब में आतंकवाद का था। बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे थे। धमकियों और दबावों के बावजूद कृष्ण लाल जी पीछे नहीं हटे और अपनी सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियां जारी रखीं। उनकी निडरता और नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं को हौसला दिया।
24 मार्च 1985 को शाम 7:30 बजे दो आतंकियों ने किताबों के सैंपल देने के बहाने उनके घर में प्रवेश कर नज़दीक से उन पर गोलियां बरसाईं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कृष्ण लाल जी ने एक हमलावर को पकड़ लिया, जिससे उसे मौके पर गिरफ्तार किया जा सका। घायल अवस्था में उन्हें पीजीआई ले जाया गया, लेकिन कुछ घंटे संघर्ष करने के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली।
कृष्ण लाल मनचंदा जी ने अपने जीवन को लोकसेवा, समाज और राष्ट्रभक्ति के लिए समर्पित किया। उनका साहस, संघर्ष और बलिदान आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया और समाज व राष्ट्रहित के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।